रिपोर्ट:News10plus एडिटर मोहम्मद राशिद (सैय्यद) टांडा अम्बेडकरनगर | जनपद सहित जनपद की सभी तहसीलों और ग्रामीण अंचलों में कर्बला के 72 शहीदों की याद में चेहलुम का ऐतिहासिक पर्व अत्यधिक अकीदत और गमगी़न माहौल में मनाया गया।
इस दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच पारंपरिक मार्गों से ताज़िया जुलूस निकाले गए, जिन्हें बाद में स्थानीय कर्बला में अकीदत के साथ सुपुर्द-ए-खाक (दफन) किया गया।
टांडा मीरानपुरा से निकला ऐतिहासिक ताज़िया जुलूस
तहसील टांडा क्षेत्र के मोहल्ला मीरानपुरा स्थित राजा मोहम्मद रज़ा कोठी से मुतवल्ली राजा सैय्यद काज़िम रज़ा के नेतृत्व में ऐतिहासिक ताज़िया जुलूस निकाला गया। जुलूस में अलम, ताबूत और ताज़िए की शबीह (प्रतीक) शामिल रही।

‘अंजुमन हुसैनिया मीरानपुरा’ तथा ‘अंजुमन सिपाह-ए-हुसैनी हयातगंज’ के तत्वावधान में निकला यह जुलूस नौहा-ख्वानी और सीना-जनी (मातम) करते हुए अपने निर्धारित पारंपरिक मार्गों से गुजरा। इसके बाद जुलूस कर्बला शाहबाग आसोपुर पहुँचा,
जहाँ ताज़िया दफन किया गया। वहाँ नज़्रो-नियाज़ के बाद मजलिस व मातम का आयोजन हुआ, जिसके साथ ही जुलूस शांतिपूर्वक संपन्न हुआ।
प्रशासन की चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था
जुलूस को सकुशल व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए टांडा पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद रहा। सुरक्षा व्यवस्था में क्षेत्राधिकारी टांडा,
कोतवाली प्रभारी निरीक्षक दीपक सिंह रघुवंशी, अलीगंज थाना प्रभारी सुनील कुमार सिंह सहित दोनों थानों के पुलिस अधिकारी, महिला पुलिसकर्मी एवं अन्य जवान तैनात रहे।
जनाब-ए-फातिमा ज़हरा को दिया पुरसा
चेहलुम के इस मोके पर अकीदतमंदों ने कर्बला के 72 शहीदों का पुरसा (शोक संदेश) हज़रत फातिमा ज़ैहरा (स.अ.) की बारगाह में पेश किया।
क्या है चेहलुम (अरबईन) का ऐतिहासिक महत्व?
लगभग 1400 वर्ष पूर्व कर्बला के मैदान में हक़ और इंसानियत की रक्षा के लिए हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके 72 वफादार साथियों ने यज़ीद की विशाल फ़ौज के खिलाफ असीम धैर्य और पराक्रम से जंग लड़ी थी। 10 मुहर्रम (आशूरा) के दिन हज़रत इमाम हुसैन शहीद हो गए।
शहादत के पश्चात यज़ीदी फौज ने पैगंबर-ए-इस्लाम के अहले-बैत (परिवार) के खैमों में आग लगा दी। इस दौरान इमाम हुसैन की बहन शहज़ादी ज़ैनब, मासूम बेटी सकीना और पुत्र इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स.) सहित कई महिलाओं और बच्चों को बंदी बना लिया गया।
उन्हें कुफा और शाम (दमिश्क) के बाजारों व दरबारों में बेड़ियों से जकड़कर ले जाया गया। कैद के दौरान मासूम सकीना अपने पिता की याद में बिलखती रहीं, जिससे जनता के बीच यज़ीद के जुल्म की हकीकत उजागर होने लगी।
जन-आक्रोश और विद्रोह के डर से यज़ीद को अहले-बैत को रिहा करना पड़ा। रिहाई के बाद इमाम हुसैन के परिवार का कर्बला पहुँचकर शहीदों का शोक मनाना और मदीने लौटना ही
चेहलुम (अरबईन) की नींव बना। यही कारण है कि यह दिन पूरे विश्व में त्याग, न्याय और मानवता के प्रतीक के रूप में अत्यंत अकीदत और गम के साथ मनाया जाता है।






