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​कूफ़ा की मस्जिद, सजदे में अली और ज़हर में बुझी तलवार: शहादत-ए-मौला-ए-का़यनात हज़रत अली की शहादत पर निकला जुलूस!

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हज़रत अली की शहादत की याद में नम आँखें: इंसाफ, इंसानियत और रहनुमाई की मिसाल

रिपोर्ट News10plus एडिटर मोहम्मद राशिद सैय्यद| टांडा अम्बेडकरनगर ! हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 21 रमज़ान को शहादत-ए-मौला-ए-कायनात हज़रत अली अलैहिस्सलाम की याद में मीरानपुरा निवासी सैय्यद रईसुल हसन ताज़ियादार कमेटी के सेक्रेटरी एवं सैय्यद वजीहुल हसन एडवोकेट के निवास स्थान से अलम और ताबूत की शबीह के साथ जुलूस निकाला गया। जुलूस टांडा कोतवाली प्रभारी निरीक्षक दीपक सिंह रघुवंशी एवं पुलिस बल की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में अपने परम्परागत मार्गों से होता हुआ आगे बढ़ा।

जुलूस राजा मोहम्मद रज़ा मस्जिद पहुँचा, जहाँ रोज़ा इफ्तार के बाद मौलाना सैय्यद रज़ा हसन ने मजलिस को संबोधित किया। मजलिस के बाद अंजुमन हुसैनिया द्वारा नौहा व मातम किया गया।

जहां हम आपको बता दें 18 रमज़ान की रात्रि से टांडा नगर क्षेत्र के राजा मोहम्मद रज़ा कोट में स्थित इमामबाड़े में मजलिसों मातम का सिलसिला शुरू रहा, साथ ही राजा के मैदान में स्थित एडवोकेट शाहिद रज़ा के निवास स्थान पर मजलिसें आयोजित की गई, वहीं मदरसा कंजुल-उलूम के पीछे स्थित शरीफ़ मंज़िल में शाकिर हुसैन नम्मू के यहां भी लगातार मजलिसें आयोजित की गईं।

 आज 21 रमज़ान को मीरानपुरा में स्थित सैय्यद वजीहुल हसन एडवोकेट/ताज़ियादार कमेटी के सेक्रेटरी सैय्यद रईसुल हसन के निवास स्थान से अंजुमन शमशीरें हैदरी, अंजुमन हुसैनिया मीरानपुरा, अंजुमन सिपाहे हुसैनी हयातगंज,

अंजुमन अब्बासिया कसरावल, के नेतृत्व में हज़रत अली की शहादत पर अलम और ताबूत के साथ जुलूस निकाला गया। जुलूस मीरानपुरा राजा मोहम्मद रज़ा मस्जिद में समाप्त हुआ, जहां रोजदारों को रोज़ा इफ्तार करवाया गया और भोजन कराया गया।

इस अवसर पर आयोजित मजलिस में हज़रत अली शेरे खुदा का ग़म मनाया गया, जो इस्लाम धर्म के रचयिता रसूले अकरम सल्लाहू अलैहे वसल्लम के जां नहीं उत्तराधिकारी दामादे पयम्बर थे।

ग़म-ए-अली में डूबी दुनिया: काले लिबास का सोग:

शिया समुदाय और हज़रत अली के चाहने वाले काले कपड़े पहनकर अपनी संवेदना व्यक्त करते हैं। मजलिस और मातम: दुनिया के हर कोने में मजलिसों का आयोजन होता है, जहाँ मौला अली के उपदेशों और उनकी शहादत के मंज़र को याद कर आँसू बहाए जाते हैं।

​यतीमों का विलाप: हज़रत अली को ‘अबू तुराब’ और ‘यतीमों का सहारा’ कहा जाता था; आज के दिन पूरी मानवता खुद को यतीम महसूस करती है।“अली के बाद कहाँ ऐसा रहनुमा होगा, जो खुद भूखा रहे और औरों को खिलाता रहे।”

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