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हक़ और इंसानियत की अमर मिसाल: आज 28 रजब को मदीने से कर्बला के लिए रवाना हुए थे हज़रत इमाम हुसैन

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टांडा अम्बेडकर नगर। टांडा के मोहल्ला मीरानपुरा में स्थित राजा मोहम्मद रज़ा मैदान के इमाम चौक से रविवार बीती रात्रि में 9 बजें अंजुमन हुसैनिया और अंजुमन सिपाहे हुसैनी के सदस्यों ने नौहा मातम व अलम के साथ जुलूस बरामद किया।

जुलूस इमाम चौक से राजा मोहम्मद रज़ा कोट में पहुंचा जहां संयुक्त अंजुमनों के सदस्यों ने नौहा मातम किया और इमाम बारगा़ह में मजलिस के बाद जुलूस समाप्त हुआ।

जुलूस समाप्त होने के उपरांत मुतवल्ली राजा सैय्यद काज़िम रज़ा के नेतृत्व में वहां शामिल हुए जायरीनों को नज़रें मौला में तबर्रुका़त तक़सीम किए गए यहां से एक बार फिर विस्तार से बताते चलू इस्लामिक उर्दू कैलेंडर के

लिए मदीना से कर्बला की ओर रवाना हुए थे। इस मौके पर बताया गया कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने अज़ीज़ो-अक़रबा और कुल 72 जांंनिसार साथियों के साथ अरब के शहर मदीना से कर्बला के लिए चले थे।

उनका पाक क़ाफ़िला 2 मोहर्रम को कर्बला की सरज़मीं पर पहुँचा। हालांकि इस बीच कर्बला पहुंचे ने चार माह से अधिक समय लगा कर्बला पहुँचते ही उन्होंने ने सबसे  पहले खैमा नसब करने के लिए ज़मीन खरीदी और फिर अपना कैम्प क़ायम किया।

कर्बला की उसी धरती पर ज़ालिम यज़ीद की लगभग दो लाख की फ़ौज के सामने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सिर झुकाने से इंकार कर दिया और हक़, इंसाफ़ और इंसानियत को बचाने के लिए डटकर मुकाबला किया।

इस ऐतिहासिक जंग में आपने अपने पूरे कुनबे और साथियों के साथ अल्लाह की राह में शहादत पेश कर दी, लेकिन ज़ुल्म के सामने झुकना क़बूल नहीं किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत ने इंसानियत को ज़िंदा कर दिया।

आज 1400 साल बीत जाने के बाद भी पूरी दुनिया उन्हें अमर शहीद के रूप में याद करती है और क़यामत तक करती रहेगी, जबकि ज़ालिम यज़ीद का नाम लेने वाला कोई नहीं है।

कर्बला का पैग़ाम आज भी हर ज़माने को यह सिखाता है कि हक़ के लिए कुर्बानी अमर होती है और ज़ुल्म मिट जाता है। कर्बला का पैग़ाम“ज़ुल्म के सामने खामोशी नहीं, हक़ के लिए कुर्बानी ही असली ज़िंदगी है।”

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